जनकक राजधानी
की दिव्य भूमि मिथिला हम आबि गेलौँ । देखैत मात्र मन लक्ष्मण तृप्त भेलौँ ॥ की दिव्य फूल फल वृक्ष अनन्त धान । पक्षी विलक्षण करै अछि रम्य गान ॥ प्रपूर्ण सत् तड़ाग की, सुधा-समान वारिसौं विचित्र पद्मिनी-बनी विहङ्ग बारि-चारिसौँ । द्विरेफ गुञ्जि-गुञ्जिकँ महा मदान्ध घूमिकँ सरोजिनीक अङ्ग सुप्त बार-बार चूमिकें ॥ शालि-गोप गीतिकाँ सुप्रीति-रीति…
